
प्राचीन भारतीय भाषाओं में वंस साहित्य की रचना हुई है। भारतीय साहित्य में ‘वंस’ या ‘वंश’ के नाम से साहित्य की रचना की गई है। प्रस्तुत लेख मुख्य रूप से प्राचीन भारतीय साहित्य के संदर्भ से संबंधित है। इस नजरिए से-
- वैदिक साहित्य
- संस्कृत साहित्य
- प्राकृत साहित्य
- पालि साहित्य
इन प्राचीन भारतीय भाषा साहित्य में निर्मित वंस साहित्य का अध्ययन प्रस्तुत लेख में किया जाएगा।
1.1 वैदिक साहित्य में वंस ग्रंथ :
यदि हम भारतीय भाषा के सन्दर्भ में विचार करें तो वैदिक काल से लेकर 500. ईसा पूर्व तक का काल सबसे प्राचीन काल माना जाता है। वैदिक भाषा के अस्तित्व का उद्भव और विकास इसी काल में हुआ है। इसी काल में वैदिक साहित्य की रचना हुई। वैदिक साहित्य वंश साहित्य है या नहीं, इस बारे में विद्वानों में मतभेद है। कुछ ब्राह्मण विद्वानों के अनुसार, माना जाता है कि वैदिक साहित्य में ‘वंश ब्राह्मण’ नामक ग्रंथ था। लेकिन यह ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं है।
1.2 संस्कृत साहित्य में वंस ग्रंथ :
वैदिक काल के दौरान वैदिक भाषा की विविधता को नियमित किया गया था। उसे एकरूपात प्रदान की गयी और इसप्रकार ऐसे नानाविध संस्कार के कारण संस्कारक्षम संस्कृत भाषा का उगम हुआ। भाषा पर अन्य कई संस्कार किए जाने के कारण संस्कृत भाषा जटिल हो गई।
बौद्धोत्तर काल के संस्कृत साहित्य में ‘हरिवंश पुराण’, ‘रघुवंश’ जैसे ग्रंथ मिलते हैं। ‘हरिवंश पुराण’ संस्कृत पौराणिक कथाओं का एक ग्रंथ प्रकार है। ‘रघुवंश’ कालिदास द्वारा क्रृत काव्यप्रकार है।
1.3 प्राकृत साहित्य में ‘वंस’ ग्रंथ :
प्रकृति से उत्पन्न भाषा प्राकृत भाषा है। व्याकरण आदि संस्कारों के विहीन संसार के समस्त प्राणियों के स्वाभाविक शब्दभाव को प्रकृती कहा जाता है। इसी से प्राकृत भाषा का निर्माण हुआ है। प्राकृत साहित्य में ‘हरिवंशचरिय’ नामक ग्रंथ का उल्लेख मिलता है। लेकिन यह ग्रंथ प्रकार आज उपलब्ध नही है , ऐसे प्राकृत भाषा के इतिहासकारोंकी मान्यता है।
अर्थात, भारतीय साहित्य में ‘वंश’ नामक संस्कृत भाषा में ‘हरिवंश पुराण’ और ‘रघुवंश’ नामक केवल दो ग्रंथ उपलब्ध हैं। डॉ. संघसेन दुबे के अनुसार पालि वंस साहित्य का प्रभाव संस्कृत ग्रंथ ‘हरिवंश पुराण’ पर मिलता है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इन दोनों ग्रंथों का रचनाकाल बहुत प्राचीन है।
1.4 पालि साहित्य में ‘वंस’ ग्रंथ :
पालि तिपिटक साहित्य की निर्मिती भारत में हुई है । तिपिटक के बाद रचित पालि साहित्य को अनुपिटक साहित्य कहा जाता है। इस अनुपिटक साहित्य का निर्माण और विकास मुख्य रूप से भारत के बाहर विभिन्न बौद्ध राष्ट्रों में पाया जाता है। वंस साहित्य पालि अनुपिटक साहित्य के अंतर्गत शामिल है। अनुपिटक साहित्य के विकास के तीन चरण माने जाते हैं। वंस ग्रंथों के कालक्रम का अध्ययन करने से पता चलता है कि इन तीन चरणों में विभिन्न वंस ग्रंथों का निर्माण हुआ है । वंस ग्रंथ विभिन्न कालखंडो में रचे गए है , इसी तरह वे विभिन्न बौद्ध राष्ट्रों में रचे गए है ।
विभिन्न बौद्ध राष्ट्रों में लिखीत वंस ग्रंथो का अध्ययन करने से यह पाया जाता है की सिंहल, बर्मा, थायलॅंड इ. बौद्ध राष्ट्रों में वंस साहित्य की निर्मिती एवं विकास हुआ। डॉ. कन्हैयालाल हाजरा इन्होंने ‘Pali Language and Literature’ इस ग्रंथ में सिंहल में लिखित वंस साहित्य, बर्मा में लिखित वंस साहित्य और थायलंड में लिखित वंस साहित्य इसतरह विभाजन करके वंस ग्रंथो का प्रस्तुतीकरण किया है।
इसलिए वंस ग्रंथों का –
1 सिंहल के पालि वंस ग्रंथ
2 बर्मा के पालि वंस ग्रंथ
3 थायलंड के पालि वंस ग्रंथ
इस दृष्टि से प्रस्तुतीकरण उक्त लेख में किया जा रहा है।

1.4.1 सिंहल के पालि वंस ग्रंथ :
डॉ. हजरा के अनुसार-
- दीपवंस
- महावंस
- चुलवंस
- बुध्दघोसुप्पत्ती
- महाबोधीवंस
- दाठावंस
- थुपवंस
- हत्थवनगल्लविहारवंस
- रसवाहिनी
- समन्तकुटवण्णना
- नलाटधातुवंस
- सासनवंसदीप
ऐसे सिंहल में कुल बारह पालि वंस ग्रंथ लिखे गए है।
1.4.2 बर्मा के पालि वंस ग्रंथ :
डॉ. कन्हैयालाल हाजरा ने बर्मा के पालि वंस ग्रंथ के बारे में इस प्रकार लिखा है –
- छकेसधातुवंस (इ.स. 1885)
- गंधवंस (सतरावे शतक)
- सासनवंस (इ.स. 1861)
इस प्रकार ये तीनों पालि वंस ग्रंथ बर्मा में लिखे गए है।
इसके भी अलावा बर्मी भाषा में अन्य वंस ग्रंथ हैं।
1.4.3 थाईलैंड के पालि वंस ग्रंथ :
सिंहल और बर्मा की तरह, थाईलैंड में भी पालि वंस ग्रंथ लिखने की परंपरा है। थाईलैंड में –
- चामदेवीवंस (1460 ई. से 1530 ई.)
- जिनकालमालीनी (16वीं शताब्दी ई.)
- संगीतिवंस (1789 ई.)
- मुलसासन (पंद्रहवीं शताब्दी ई.)
- सिहिंगानिदान (तेरहवीं – चौदहवीं शताब्दी ई.)
- रत्नबिंबवंस (सोलहवीं – सत्रहवीं शताब्दी ई.)
- पंसावदान
- पठमसंबोधी (7वीं शताब्दी ई.)
- उप्पातसंती
- सद्धम्मसंगह (ग्यारहवीं – बारहवीं शताब्दी)
इसी तरह से थाईलैंड में भी पालि वंस ग्रंथों की रचना की गई है।
डॉ. हाजरा ने कुल छब्बीस ग्रंथो को पालि वंस ग्रंथ कहा है और उनके बारे में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Pali Language and Literature’ में अधिक विस्तार से लिखा है।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, वंस ग्रंथ संपदा वैदिक साहित्य, संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य और पालि साहित्य में पाई जाती है।